ख्वाहिशों की गुस्ताखियाँ बहुत ही गुज़ारिशों से शायद, उनकी रूह को हम आवाज़ देतें हैं, के वो हर उस मोड़ पर, अक्सर मिल जातें हैं हमें, जहां दिल की धडकनें घबराहट से सहम जाती हैं। वो आज शाम फिर से रूबरू हुए, के रूह ने इतनी शिद्दत से पुकारा था, और मुलाकात भी हुई वहां, जहां हमने कभी एक साथ मिलकर, एक-दुसरे का परदाह हटाया था, और आगोश में कुछ वक्त साथ गुज़ारा था। हर चुप्पी साधी चीज़ उस जगह की, चीख रही थी दिल की गहराईयो से, और बयां कर रही थी वो एक ख़ास दिन, जिसे याद करके अब पछतातें हैं वो। और अब नफरत है सिर्फ शायद मेरे लिए बची। वो शांत पड़ी ज़मीन उस जगह की, संजोए रखे थी हम दोंनों के मिलते हुए कदमों के निशां, जो रूला गई अंतह तक मेरी रूह को। वो मेज और उसपर रखे सामानों के अलावा, और भी कुछ बिखरा पडा था, जो सिवाय मेरे किसी की भी नज़रों में न था। एकाएक उठ कर चले जाने का खयाल आया, पर जाऐं भी तो कहां तुमसे बचकर, ये रूह जो तुम्हारी हर वक्त साथ रहती है। वो बंद खिडकियाँ और अल्मारियाँ, झाँक रही थी मुझे और पुछ रही थी, फिर से आने का कारण, शायद सिर्फ उसे ही नहीं, उसके घर को भी मेरे फिर से आने की ख़ुशी न हुई।...
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हक़ीक़त मैं समेटनें में ग़ुम थी ख्वाबों को कहीं, के हक़ीक़त से सामना हो गया। वही जो पिरोए ख्वाब थे, फिर रख छोड़े दिल-ए-संदूक में। इतमीनान से मिली इस हक़ीक़त से मैं, और समझ में आया वो जो समझ से परे है। ये हक़ीक़त क्या ख्वाब से कम है? क्या उम्र है इस जिंदगी के हक़ीक़त की? यह लम्हें भी तो ख्वाब हैं, यह आशियाना भी तो ख्वाब है। क्या हम परदा डालें हैं, एक पहले और आख़री सत्य से? क्या छिपा दिया है पल्कों में, हक़ीक़त को हमनें ख्वाबों की तरह? क्या फिर घरोंदा बनाऐंगे हम, हक़ीक़त-ए-ख्वाबों भरे जिस्म में रहने को? क्या फिर जिस्म-ए-महल को सजाऐंगे हम, जब वजूद-ए-हक़ीक़त का पता नहीं? जब अनजान हैं इसकी उम्र से हम, तो क्या हक़ीक़त सच में हक़ीक़त है, या फिर ढलेगी यह भी, रातों में आए मेहमान ख्वाबों की तरह? कुछ तो असर हुआ होगा रूह पर, इस मेहमान-ए-ज़िंदगानी का, के जब ख्वाबों का अंत होगा हक़ीक़त में, और जिंदगी बंद कर देगी अपनी नज़रें, तो हो ही जाऐ हक़ीक़त से सामना। इन ख्वाबों और हक़ीक़त में अंतर कुछ तो रूह को समझ आऐ। और कह सकूं मैं भी, के हाँ वाकिफ हूँ मैं हर एक हक़ीक़त के पहलू से। - Shifa (Meenu Butola...