हक़ीक़त

मैं समेटनें में ग़ुम थी ख्वाबों को कहीं,
के हक़ीक़त से सामना हो गया।
वही जो पिरोए ख्वाब थे,
फिर रख छोड़े दिल-ए-संदूक में।
इतमीनान से मिली इस हक़ीक़त से मैं,
और समझ में आया वो जो समझ से परे है।
ये हक़ीक़त क्या ख्वाब से कम है?
क्या उम्र है इस जिंदगी के हक़ीक़त की?
यह लम्हें भी तो ख्वाब हैं,
यह आशियाना भी तो ख्वाब है।
क्या हम परदा डालें हैं,
एक पहले और आख़री सत्य से?
क्या छिपा दिया है पल्कों में,
हक़ीक़त को हमनें ख्वाबों की तरह?
क्या फिर घरोंदा बनाऐंगे हम,
हक़ीक़त-ए-ख्वाबों भरे जिस्म में रहने को?
क्या फिर जिस्म-ए-महल को सजाऐंगे हम,
जब वजूद-ए-हक़ीक़त का पता नहीं?
जब अनजान हैं इसकी उम्र से हम,
तो क्या हक़ीक़त सच में हक़ीक़त है,
या फिर ढलेगी यह भी,
रातों में आए मेहमान ख्वाबों की तरह?

कुछ तो असर हुआ होगा रूह पर,
इस मेहमान-ए-ज़िंदगानी का,
के जब ख्वाबों का अंत होगा हक़ीक़त में,
और जिंदगी बंद कर देगी अपनी नज़रें,
तो हो ही जाऐ हक़ीक़त से सामना।
इन ख्वाबों और हक़ीक़त में अंतर
कुछ तो रूह को समझ आऐ।
और कह सकूं मैं भी,
के हाँ वाकिफ हूँ मैं
हर एक हक़ीक़त के पहलू से।

- Shifa (Meenu Butola)

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