ख्वाहिशों की गुस्ताखियाँ

बहुत ही गुज़ारिशों से शायद,
उनकी रूह को हम आवाज़ देतें हैं,
के वो हर उस मोड़ पर,
अक्सर मिल जातें हैं हमें,
जहां दिल की धडकनें
घबराहट से सहम जाती हैं।
वो आज शाम फिर से रूबरू हुए,
के रूह ने इतनी शिद्दत से पुकारा था,
और मुलाकात भी हुई वहां,
जहां हमने कभी एक साथ मिलकर,
एक-दुसरे का परदाह हटाया था,
और आगोश में कुछ वक्त साथ गुज़ारा था।

हर चुप्पी साधी चीज़ उस जगह की,
चीख रही थी दिल की गहराईयो से,
और बयां कर रही थी वो एक ख़ास दिन,
जिसे याद करके अब पछतातें हैं वो।
और अब नफरत है सिर्फ
शायद मेरे लिए बची।
वो शांत पड़ी ज़मीन उस जगह की,
संजोए रखे थी हम दोंनों के
मिलते हुए कदमों के निशां,
जो रूला गई अंतह तक मेरी रूह को।
वो मेज और उसपर रखे सामानों के अलावा,
और भी कुछ बिखरा पडा था,
जो सिवाय मेरे किसी की भी नज़रों में न था।
एकाएक उठ कर चले जाने का खयाल आया,
पर जाऐं भी तो कहां तुमसे बचकर,
ये रूह जो तुम्हारी हर वक्त साथ रहती है।

वो बंद खिडकियाँ और अल्मारियाँ,
झाँक रही थी मुझे और पुछ रही थी,
फिर से आने का कारण,
शायद सिर्फ उसे ही नहीं,
उसके घर को भी मेरे
फिर से आने की ख़ुशी न हुई।
हमराज़ थी हर एक चीज़ वहाँ की,
जिनसे कतरा रही थी मेरी आँखें,
के कब कोई राज़ खोल जाए,
के खिडकियाँ खुलते ही,
ये एक राज़ बाहर न झाँक ले,
और हल्की सी आहट से,
कुछ बीते पल यादों की हथेली से,
फिसल न जाऐं।

नज़रों को झुकाए मैं,
बस इंतज़ार में थी उस पल के,
की कब अंधेरा आकर सीने से लगा ले उस घर को
और उस अंधेरे की आड़ में,
मैं बच निकलुं घुरती हुईं अनगिनत आखों से,
मगर उम्मिद यह भी थी,
के मेरे अल्विदा कह जाने पर,
आएगी फिर से रौशनी उस घर में
एक नई सौगात लेकर।

हाँ मान लिया के कल शायद
तुम लौट आओगे,
और जानती हुँ के तुम सिर्फ
जिस्म के ज़रिये रूह तक टहलकर
फिर से चले जाओगे ,
पर बतलाओ तो सही,
के क्या सिर्फ ये ही इरादा था तुम्हारा,
या कभी सेचा था अनंत तक साथ चलने की।

क्या था ये सिर्फ जिस्मानी,
या रूहानी भी कुछ था,
क्या बता पाओगे तुम
और तुम्हारे घर की हर एक चीज़
जो आज बेताब है
मुझे कठघरे में खडा करने को।
क्या यह इम्तिहाँ सिर्फ मेरा है,
या तुम्हे भी गुज़रना होगा उन लहरों से,
जिनमें बह रहीं हैं ख्वाहिशों की गुस्ताखियाँ।

- Shifa (Meenu Butola)

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